सत्ता के साथ बदल गई बिलासपुर की फ़िजा, कल तक जो उस “भैया” के साथ थे आज इस “भैया” के साथ हो लिए, लोग कहते हैं फूल छाप कांग्रेसी हैं ये खतरों के खिलाड़ी…

.मोहम्मद यासीन अंसारी.

खबरची.in, बिलासपुर। वक़्त हमेशा बदलता रहता है। यूं कहें कि परिवर्तन प्रकृति का नियम ही है। सबकुछ बदल जाता है। हवा-पानी, परिदृश्य और इंसान भी। सत्ता भी कभी किसी एक के हाथ में नहीं रहती। कभी इसके पास, तो कभी उसके हाथ।

फिर भला इंसान इससे अछूता कैसे रहे, और रह भी नहीं सकता, क्योंकि उसके साथ तो स्वार्थ जुड़ा रहता है, हमेशा से। इसलिए जहाँ जैसा स्वार्थ सधे व्यक्ति उसके साथ हो जाता है। अब लोग भले ही उन्हें मौका परस्त, स्वार्थी, या फिर धोखेबाज कहते फिरें। लेकिन समय के साथ पलटी खाने वाले लोग इसे सामान्य बदलाव ही मानते हैं। कुछ वैसे भी लोग होते हैं जो दो नावों में सवार रहते हैं, एक पैर इसमें तो दूसरा पैर उसमें। इसके बाद जो साहिल तक पहुंचने लगे दोनों पैर उसमें जमा लेते हैं। हालांकि इसमें डूबने का खतरा भी बहुत बड़ा है, लेकिन ये उनकी फितरत है, इसलिए वे ऐसे जोखिम उठाते रहते हैं, खतरों के खिलाड़ी की तरह।

अभी हमारे छत्तीसगढ़ की फ़िजा बदली हुई है, सत्ता परिवर्तन के साथ हवा-पानी और भी बहुत कुछ। जाहिर है लोग भी बदले, और बदलेंगे। ये साफ नज़र भी आ रहा है। कहीं दूर नहीं, हमारे शहर में ही दिख रहा। पार्टी से फ़र्क नहीं पड़ता, बल्कि जो कल तक उस भैया के साथ थे, आज इस भैया के साथ हो लिए। आज “भूपेश भैया” आ रहे हैं, तो भी ये दिख रहा। ऐसी कई तस्वीरें इस भैया के साथ नज़र आ रहीं, जो कल तक उस भैया के बंगले में नज़र आते थे। राजनीतिक भाषा में लोग उन्हें “फूल छाप कांग्रेसी” के नाम से भी पुकारते हैं। बता दें कि इनमें कांग्रेस के बड़े पदाधिकारी और निगम की सत्ता में सक्रिय रहे नेता भी शामिल हैं। बल्कि जब इन्हें जिले के संगठन में बड़ा ओहदा मिला तो लोग ये भी कहने लगे थे कि अब तो कांग्रेस की वापसी असंभव ही है। क्योंकि ये बड़े पदाधिकारी घुन बनकर कांग्रेस को भीतर ही भीतर तेजी से चाट जाएंगे। कोशिश भी हुई, हालांकि अधिक फ़र्क नहीं पड़ा।

ये सिर्फ एक नहीं, बल्कि इन जैसे कई लोग हैं, जिनकी रोजी-रोटी पहले वाले भैया के भरोसे ही चलती थी। आखिर 15 साल कम भी नहीं होते। लेकिन ये जो नारा चला “वक़्त है बदलाव का” इसने सबकुछ बदलकर रख दिया। जनता जनार्दन ने सत्ता बदल दी। दो नावों में पैर रखने वालों ने शायद समय रहते इसे महसूस कर लिया था। इसलिए कुछ ने तो पुराने भैया को चकमा भी दे दिया, और उनकी लुटिया डूबा दी। चुनावी मैनेजमेंट के माहिर कहे जाने वाले भैया, हर बार इनके भरोसे भवसागर पार कर लिया करते थे, लेकिन इस बार ये प्यादे ज्यादा कुछ कर नहीं पाए, और भैया मात खा गए।

बहरहाल, अब ये प्यादे नए शहंशाह के खेमे में हैं, और इसके-उसके सहारे अपनी भूमिका बना और तलाश रहे हैं। शहंशाह के लिए चुनौती ये, कि ऐसे लोगों से वे निपटें कैसे। फिलहाल तो कोई खतरा नहीं दिख रहा, लेकिन समय तो समय है, बदलता रहता है। जाने कब क्या रंग दिखा जाए, इसलिए सावधानी बेहद जरूरी है।

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