“महिलाएं कमतर नहीं पुरुषों से, लेकिन पुरूषवादी-रूढ़िवादी सोच की जंजीरें आज भी जकड़ती हैं’

0 महिला दिवस पर विशेष

अनिल बामने. बिलासपुर।
नए दौर में स्थितियाँ बहुत बदल चुकी हैं। सेवा का क्षेत्र हो या कारोबार का, महिलाएँ आज कंधे से कंधा मिला कर चल रही हैं। महिलाओं की आगे बढ़ने की इच्छाशक्ति ने ही उन्हें समाज में बराबरी और सम्मान का अहसास कराया है। आज के दौर में कोई भी महिलाओं को पुरुष से कमतर नहीं कह सकता। पुरुषवादी सोच और व्यवस्था को महिलाएँ स्वयं चुनौती देते हुए अपनी मेहनत और लगन से अपना मुकाम हासिल कर रही हैं।

शिक्षा, स्वास्थ्य, विज्ञान, कारोबार, राजनीति अमूमन सभी क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है। भारतीय समाज में पिछले कुछ सालों में आये परिर्वतन इस बात को साबित करते हैं कि महिलाएं समाज के असंतुलित गर्त से उभरकर बदलाव के मार्ग पर अग्रसर हो रही हैं। अब वे चूल्हे चौंके तक सीमित नहीं रहना चाहतीं, बल्कि घर की चार दीवारी से आज़ाद होकर जीना चाहती हैं।

परंतु एक कड़वा सत्य यह भी है कि तमाम दावों और प्रयासों के बावजू़द महिलाओं के साथ अलग-अलग स्तर पर भेद-भाव में सुधार की स्थिति अपेक्षाकृत ठीक नहीं है। हम कानून बनाकर सभी परिस्थितियों में बदलाव नहीं कर सकते, यह बात स्वीकारनी होगी। कानून बनाकर आप कुछ परिस्थितियों पर अंकुश लगाने में सफल हो जाएं परंतु यह स्थायी हल नहीं है। कहीं न कहीं सामाज में व्याप्त सोच में बुनियादी परिवर्तन करने की आवश्यकता है।

समाज का परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। परिवार और देश दुनिया को बेहतर बनाने के लिए संतुलन बहुत जरूरी है। अन्यथा यह कैसे संभव है कि देश की आधी आबादी को हाशिये पर रखकर एक बेहतर दुनिया गढ़ने की कल्पना करें।

शादी और अन्य निर्णय-

बदलते हुए दौर में भी समाज रुढ़ीवादी सोच की जंज़ीरों से जकड़ा हुआ है। देश में कई उदाहरण हैं, जिन्हें आये दिन अखबार, टेलीविजन और अन्य सोशल मीडिया के माध्यम से देखने सुनने को आते हैं। जैसे लड़की अपनी इच्छा से वर का चुनाव नहीं कर पाती या अंतरजातीय प्रेम एवं विवाह आज भी समाज में नाक के सम्मान के लिए बलि चढ़ जाता है। महिला शिक्षित और जागरुक तो हो रही, परंतु उनकी भावनाओं और इच्छाओं पर कहीं न कहीं पितृसत्तात्मक सोच की पहरेदारी बनी हुई है, जिससे वह आज भी पारिवारिक निर्णयों में भागीदारी निभाने से कोसों दूर उपेक्षित और सिमटी हुई है।

समपत्ती का अधिकार –

संविधान से बराबरी का हक पाने के बाद भी महिला दोयम दर्जे की नागरिक बनी हुईं हैं। यह स्थिति देहरी से लेकर दफ्तर तक, हर जगह है। तमाम प्रयासों के बाद भी महिला अपनी पहचान कनूनी तौर पर कागज़ के पन्नों मे तो बना पाई, लेकिन वास्तविक रूप से आज भी मोहताज है। हर जगह महिला को सामाजिक इम्तहानों से गुजरना पड़ता है। पैतृक संपत्ति का हक कानूनी रूप से तो मिला है, लेकिन मायके से मिलने वाली संपत्ति का हिस्सा लेने पर रिश्ते की डोर किस तरह टूटती है, ये सर्व विदित है।

श्रम या वेतन में भेदभाव –

सरकार प्रयास तो कर रही, लेकिन पूर्णतः सफलता पाने के लिए लोगों और समूचे मानव समाज की मानसिकता में परिर्वतन की दरकार है। क्योंकि आज भी पुरुष की तुलना में महिला को 20 फीसदी कम मानधन दिया जाता है। यह मास्टर सैलरी इंडेक्स की नवीनतम रिपोर्ट में बताया गया है।

धार्मिक सामाजिक बंधन –

अधिकांश धर्मिक नीतिनियम एवं बाध्यताएं महिलाओं पर ही थोपी गई हैं। माहवारी के दौरान धार्मिक स्थलों में नहीं जाना, उपवास रखना, पर्दा करके रहना, घर से निकले में रोकटोक आदि। धार्मिक रीतिरिवाज सभी धर्मो में भिन्न -भिन्न रूप में व्याप्त हैं।

सेहत की अनदेखी-

अमूमन बीमार होने पर महिला तो घर के किसी भी पुरुष की देखभाल बखूबी करती है, लेकिन महिला का स्वास्थ्य खराब होने पर उपचार में देरी या उसकी देखभाल को ज्यादा महत्व नहीं देना यह आज भी हमारे समाज की सोच का एक हिस्सा है।

कार्य विभाजन-

हमारे समाज ने कार्य का बटबारा भी लैंगिकता के आधार पर कर दिया है। कौन सा काम कौन करेगा। महिला क्या-क्या काम करेगी, पुरुष क्या-क्या काम करेगा। यह भी सत्ता बरकरार रखने और महिला को कमजोर आंककर महिला के मनोबल को कुचलने जैसा है।

लैंगिक समानता –

हमारे देश में लिंग आधारित भेदभाव आज भी है। जन्म से लेकर मृत्यु तक, शिक्षा से लेकर रोज़गार तक, हर जगह पर लैंगिक भेदभाव साफ दिखाई देता है। इसे कायम रखने में सामाजिक और राजनीतिक पहलू बड़ी भूमिका निभाते हैं। वर्ल्ड इक्नॉमिक फोरम की सालाना जारी की जाने वाली गैप रिपोर्ट के मुताबिक 144 देशों की सूची में भारत 87वां स्थान है। इससे यह साफ है कि ंिलंग भेदभाव की जड़ें कितनी गहराई तक और कितनी मजबूत है।

प्रशासनिक कदम-

सरकार महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए कई कार्यक्रम और अर्थिक आयोपार्जन जैसे कदम उठा रहीं है, जिससे समाज और देश महिलाओं की भागीदारी को सुनिश्चित किया जा सके, लेकिन ग्रामीण भारत के महिलाओं से मिलकर ऐसे प्रतीत होता है कि योजना ऊपर से आते हुए कहीं अटक गई हैै। हालांकि अब अच्छी बात यह है कि आज सोशल मीडिया का उपयोग महिलाएं अपनी भावना व्यक्त करने के लिए करने लगी है। लेकिन ग्रामीण भारत में सूचना संचार की अभी भी बहुत कमी है।

सोच बदलने से हो शुरुआत-

सफर लंबा है, लेकिन नामुमकिन नहीं। आज हम डिजिटल इंडिया की बात कर रहे हैं। स्मार्ट सिटी और बुलेट ट्रेन की बात कर रहे हैं। मंगल ग्रह पर जीवन यापन करने की सोच रहे हैं, लेकिन इसके साथ मानसिक सोच परिर्वतन की बात भी करनी होगी। महिलाओं के प्रति बनी सोच का बदलना जरूरी है। सत्तावादी सोच के दायरे से बाहर निकलना होगा। इंसानियत और मानवीयता को समझने की दरकार है। उपदेश देने या कानून बनाने से बुनियादी बदलाव होना दूर की कल्पना है। अपने घर से ही शुरुआत करनी होगी। तब कहीं हम एक सशक्त और संतुलित समाज का निर्माण कर पाने में महती भूमिका निभा पाएंगे।

(यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं। खासकर सुदूर ग्रामीण-वन क्षेत्रों में स्वास्थ्य, शिक्षा, नशामुक्ति, जागरुकता व ग्रामीणों को स्व-रोजगार से जोड़कर सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।)

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