जोगी कांग्रेस के नेताओं के कांग्रेस में शामिल होने के क्या हैं सियासी मायने… लोकसभा चुनाव में अटल श्रीवास्तव को इससे कितना होगा फायदा…

बिलासपुर (khabarchi.in) इस समय छत्तीसगढ़ की राजनैतिक फ़िज़ा की बात की जाए तो यह स्पष्ट है कि विधानसभा चुनाव के बाद प्रदेश के मुख्यमंत्री भुपेश बघेल बड़े राजनैतिक क्षत्रप बन कर उभरे हैं। और उनके इस प्रभाव में जिनका पराभव होता दिख रहा है वो हैं पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी। जोगी ने विधानसभा चुनाव के पूर्व अपनी राजनैतिक पार्टी अपने बूते खड़ी की थी। यदि बिलासपुर जिले की बात की जाए तो यह उनके सर्वाधिक प्रभाव में रहा।

जिले के लगभग दर्जन भर नेता जो विधानसभा स्तर पर अपना गहरा प्रभाव रखते थे, उनके साथ उनकी पार्टी छत्तीसगढ़ कांग्रेस जोगी में जा मिले। उनमें प्रमुख नाम रहे जिले से बाहर के , लेकिन लोकसभा में शामिल और अपना गहरा प्रभाव रखने वाले पूर्व विधायक धरमजीत सिंह, बिल्हा विधायक सियाराम कौशिक, जोगी जी की पत्नी कोटा विधायक रेणु जोगी, पूर्व विधायक चंद्रभान बारमते, बसपा से तख़तपुर विधानसभा का 2013 का चुनाव लड़ चुके संतोष कौशिक एवं कांग्रेस की टिकट पर बिलासपुर विधानसभा के लगातार दो बार और 1998 में बिलासपुर विधानसभा का निर्दलीय चुनाव लड़ कर कांग्रेस से अधिक वोट प्राप्त करने वाले साथ ही जोगी परिवार के क़रीबी अनिल टाह का नाम प्रमुख रहा।

विधानसभा चुनाव में इनमें से प्रत्याशी रहे और चुनाव जीतने वाले कोटा से श्रीमती रेणु जोगी और लोरमी विधायक धरमजीत सिंह; किन्तु पराजित होने वाले प्रत्याशी में बड़े नाम रहे मुंगेली से चंद्रभान बारमते, तख़तपुर से संतोष कौशिक, बिल्हा से सियाराम कौशिक और बेलतरा से अनिल टाह।

इनमें से रेणु जोगी और धरमजीत सिंह को छोड़कर सभी कांग्रेस प्रवेश कर चुके हैं। इनमें अनिल टाह के कांग्रेस प्रवेश के राजनैतिक मायने समझने का हमने प्रयास किया।
अनिल टाह निश्चित ही जोगी परिवार में अपनी खासी भूमिका राखते थे। उन्होंने 1998 में बिलासपुर विधानसभा से निर्दलीय चुनाव लड़ कर उस समय के कद्दावर मंत्री एवं बिलासपुर विधायक बी आर यादव के पुत्र कृष्णकुमार यादव (राजु) को पीछे छोड़ कर दूसरा स्थान हासिल किया। बाद में कांग्रेस प्रवेश कर उन्होंने 2003 और 2008 में बिलासपुर विधानसभा से कांग्रेस की टिकट पर चुनाव लड़ा और दूसरा स्थान हासिल किया। दोनों ही चुनाव में उन्हें टिकट दिलाने का श्रेय गया पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी को। यही नहीं अजीत जोगी के लिए चुनौतीपूर्ण चुनावों में से एक महासमुंद लोकसभा चुनाव जो श्री जोगी कद्दावर नेता वी सी शुक्ल के विरुद्ध लड़ रहे थे का चुनाव प्रबंधन भी अनिल टाह ने ही किया था।

लेकिन अब उन्होंने जोगी को छोड़ कांग्रेस में प्रवेश किया, इसका सिर्फ एक ही आशय है कि इस विधानसभा चुनाव के बाद जोगी का रंग फीका पड़ गया है। दूसरे शब्दों में भूपेश बघेल के कद के आगे जोगी का कद छोटा हो गया है। इसमें दो राय भी नहीं होगी, क्योंकि जोगी को कांग्रेस से बाहर का रास्ता दिखाने का श्रेय बघेल को ही जाता है, और उनकी ज़िद ही कांग्रेस को सत्ता तक पहुचा पाई है। बघेल ने इस लोकसभा चुनाव में बिलासपुर से उतारा है अटल श्रीवास्तव को, जो उनके खास समर्थक माने जाते हैं। अब अटल की जीत का अर्थ है भुपेश की जीत और पूरे प्रदेश में भूपेश बघेल की स्वीकार्यता पर मुहर।

बघेल यह बखूबी समझ रहे होंगे, कि अटल की जीत-हार उनके साथ जोड़ी जाएगी। शायद इसलिए वह कोई कसर बाकी नहीं रखना चाहते। मुख्यमंत्री का अनिल टाह को कांग्रेस में प्रवेश देने का आशय है टाह का निजी वोट बैंक, जो उन्होंने बेलतरा और बिलासपुर विधानसभा में खड़ा किया है, उसे कांग्रेस की तरफ मोड़ना। लेकिन क्या यह संभव हो पाएगा…?
इसी तरह हाल के विधानसभा चुनाव में कम वोटों से हारने वाले मुंगेली के चंद्रभान और तख़तपुर के संतोष कौशिक का भी अपना पर्सनल वोट बैंक है। इन वोटों को भी साधने की कोशिश हो रही है…और यदि संभव हुआ तो अटल की जीत और भूपेश की स्वीकार्यता यह दोनों एक साथ तय होगी। अगर ये चुनावी नैया पार लगी, तो प्रदेश की राजनीतिक रणभूमि में भूपेश सबसे बड़े क्षत्रप साबित होंगे।

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