सिर्फ नशामुक्ति ही नहीं, बल्कि ग्रामीणों को स्वरोजगार से जोड़कर आत्मनिर्भर भी बना रही जन स्वास्थ्य सहयोग संस्था…इतने कम समय में 300 से अधिक लोगों की जिंदगी में आई नई रोशनी…

बिलासपुर @ खबरची। नशामुक्ति के लिए अनेक सामाजिक संस्थाओं द्वारा कार्य किया जा रहा है, लेकिन जन स्वास्थ्य सहयोग संस्था ने न सिर्फ नशामुक्ति के लिए संकल्प के साथ ग्रामीण अंचल में काम किया बल्कि नशे के आदी हो चुके लोगों को समूह बनाकर नशे से मुक्ति दिलाई। साथ ही उनके उपचार की व्यवस्था कर उन पर निगरानी रखी। इतना ही नहीं बल्कि समूह बनाकर उन्हें रोजगार भी उपलब्ध कराया।

इसी सन्दर्भ में शराब नशा मुक्ति महासंघ मुंगेली व बिलासपुर की वार्षिक बैठक अचानकमार अभ्यारण के वन ग्राम राजक में आयोजित की गई। इसमें नशा मुक्ति अभियान की समीक्षा हुई एवं मुंबई की डॉक्टर जन स्वास्थ्य सहयोग संस्था में अपनी सेवा प्रदाय कर रहीं डॉ. उज्जवला कलम्बे ने शराब नशामुक्ति महासंघ की बैठक में शराब के सेवन करने से होने वाले शारीरिक, सामाजिक, आर्थिक, नुकसान से लोगों को अवगत कराया। उन्होंने अन्य स्थानों पर भी इस तरह नशामुक्ति अभियान चलाने पर जोर दिया।
सामाजिक कार्यकर्त्ता अनिल बामने द्वारा यह सवाल उठाया गया कि समय-समय पर शराबबंदी की मांग छत्तीसगढ़ में उठती रही है, लेकिन सरकार ने इस विषय पर कभी ठोस कदम नहीं उठाए। जिन प्रदेशों में ठोस कदम उठाए भी हैं, तो उन प्रदेशों में शराब के आदी व्यक्तियों के लिए योजनाबद्ध तरीके से कोई काम नहीं किया गया। इस वजह से शराब के नशे की लत के आदी व्यक्तियों में स्वास्थ्य की परेशानी बढ़ी। साथ ही अन्य राज्यों से शराब की आवक महंगी दर पर बढ़ गई जिसके कारण शराबबंदी का जितना फायदा अपेक्षित था, वह हुआ नहीं।

नशामुक्ति महासंघ की बैठक में 15 गाँव के नशा मुक्ति महासंघ से जुड़े लोगों ने बड़ी संख्या में हिस्सा लिया। जन स्वास्थ्य सहयोग से सेवाराम धुर्वे, सीताराम साकत, नरेश आर्मो बजरंग, हरिनंदन रामचरण, राज्किमर बैगा, धर्मेन्द्र आदि उपस्थित थे।

7 साल से ग्रामीण क्षेत्र में अलख जगा रही संस्था

जन स्वास्थ्य सहयोग गनियारी का शराब नशा मुक्ति कार्यक्रम एक अनुकरणीय और आदर्श कार्यक्रम के रूप में स्थापित हुआ है, जिसमें शराब के नशे की लत से पीड़ित व्यक्तियों के समूह बनाकर उनका शारीरिक उपचार और साथ ही पारिवारिक वातावरण कैसे अनुकूल बनाया जा सकता है इस पर गंभीरता से काम हुआ। जन स्वास्थ्य सहयोग संस्था गनियारी इस पर सन 2012 -13 से निरंतर ग्रामीण क्षेत्रों में काम कर रही है।

नशे से दूर होकर रोजगार से जुड़े ग्रामीण

शराब नशा मुक्ति समूह के सदस्य सामूहिक रूप से मछली पालन, मुर्गी पालन, सत्तू निर्माण, और वनोपज जैसे व्यवसाय करते हुए अपने परिवार के साथ एक कुशल जीवन यापन करने में कामयाब हुए हैं। संस्था ने ग्रामीण क्षेत्रों में शराब नशा मुक्ति समूह बनाए हैं जिनकी वर्तमान मैं समूहों की संख्या 15 है और लगभग 300 से भी ज्यादा लोगों ने शराब पीने की बुरी लत से छुटकारा पाकर एक अच्छे जीवन यापन करने में सफलता पाई है। संस्था द्वारा इन समूहों के सदस्यों की स्वास्थ्य जांच समय-समय पर चिकित्सक द्वारा की जा रही है।

हालात चिंताजनक…

भारत में लगातार बढ़ रही शराब की खपत

हाल में ही प्रकाशित द लांसेट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में शराब की खपत में सन 2010 से 2017 के दौरान 38 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और यह मात्रा प्रति वर्ष 4.3 से 5.9 प्रति व्यस्क (व्यक्ति) रही है। उन्होंने इस बारे में भी अवगत कराया। उन्होंने बताया कि एवं विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार, देशभर मे महिला उत्पीड़न के 85% मामले शराब पीने के बाद होते हैं और भारत में 30% लोग प्रतिदिन शराब पीते हैं।

इसी संदर्भ में छत्तीसगढ़ के आंकड़े देखें तो 12 से 15% लोग प्रतिदिन शराब पीते हैं। चौंकाने वाला यह भी एक तथ्य सामने आया है कि भारत में स्वास्थ्य के ऊपर होने वाले खर्चे औसत 56 रुपये प्रतिमाह हैं, जबकि इससे भी ज्यादा एक व्यक्ति शराब पीने में खर्च कर देता है। औसत एक व्यक्ति भारत में ₹1000 से लेकर 1250 रू तक प्रति वर्ष शराब पीने पर खर्च कर देता है।

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